अँधेरा हुआ बन्धु गहरा उधर है।
मगर मिल न पाई अभी तक डगर है।।
वहीं से खड़ा देखता वो सभी को।
जहाँ पर पहुँचती नहीं ये नज़र है।।
पता भूलकर फिर रहे सब भटकते।
जिसे ढूँढते हम नहीं वो इधर है।।
सरल आप इसको न इतना समझना।
कठिन ज़िन्दगी का बहुत ही सफर है।।
वही जीत लेता समर ज़िन्दगी का।
जिसे मौत का भी नहीं कोई डर है।।
चले जा रहे लोग अपनी ही धुन में।
किसी को नहीं अब किसी की खबर है।।
जिसे सीख कर हैं लगे लोग उड़ने।
मुझे आ न पाया अभी वो हुनर है।।
हुए लोग चिकने घड़े इस तरह से।
जरा भी नहीं हो रहा अब असर है।।
अमरबेल जब से हटाई है तन से।
उपेक्षित खड़ा दूर तब से शज़र है।।
जहाँ प्यार मिलता रहा अजनबी को।
समझ में न आता वही ये नगर है।।
----- राम लखन शर्मा ग्वालियर